Thursday, May 14, 2026

क्षमा से मिली स्वतंत्रता: जानें कैसे पाप-स्वीकार आपको स्वतंत्र करता है | Freedom Through Forgiveness: Learn How Confession Sets You Free

खीस्त में मेरे प्रिय भाईयों और बहनों, आप सभी को जय येसु।

आपके मन में कई बार यह प्रश्न अवश्य उठा होगा कि क्या वाकई में अपने पापों को स्वीकार करने से हमें क्षमा मिलती है? क्या वाकई में पापों को स्वीकार करना हमें स्वतंत्रता दे सकता है? यदि आप इन प्रश्नों का उत्तर तलाशने में कठिनाई का अनुभव करते हैं तो आज के इस आलेख में मैं पाप-स्वीकार की प्रासंगिकता और आध्यात्मिक उन्नति में इससे मिलने वाली मदद के बारे में बात करूँगा।

प्रिय भाईयों और बहनों, आप सभी का “येसु मसीह में नया जीवन” वेबसाइट में हार्दिक स्वागत है। इस वेबसाइट के माध्यम से मैं आप लोगों के सामने हिन्दी में बाइबल पठन, अध्ययन, प्रार्थना, मनन-चिंतन तथा ऐसी सामग्रियाँ उपलब्ध कराता हूँ जो लोगों को प्रभु येसु को जानने तथा उनकी शिक्षा के अनुसार अपने जीवन को ढ़ालने की प्रेरणा देती हैं। 

आज का आलेख शुरू करने से पहले आपसे आग्रह है कि कृपया इस आलेख को आखिर तक जरूर पढ़ें ताकि आप इस विषय को अच्छी तरह से समझ सकें। 

आइये, आज के विषय “क्षमा से मिली स्वतंत्रता: जानें कैसे पाप-स्वीकार आपको स्वतंत्र करता है” पर मनन-चिंतन शुरू करते हैं। 






पाप-स्वीकार क्या है?


हमारे जीवन में कई बार ऐसे मौके आते हैं जब हमसे जाने अनजाने में कोई पाप हो जाता है। एक सामान्य व्यक्ति के तौर पर जब भी हमें इस बात का एहसास होता है तो हम आत्मग्लानि से भर जाते हैं। हमें इस बात का बेहद अफसोस होता है कि हमसे पाप हुआ है। यह बात हमें अंदर ही अंदर खाये जाती है और हमें अपराध-बोध से भर देती है।

पाप कर चुकने के बाद की आत्मग्लानि, अफसोस तथा अपराध-बोध ही पश्चाताप कहलाता है। यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं हम अपने किये पर शर्मिंदा होते हैं और इस बात के प्रति सजग हैं कि हमने ईश्वर की मर्जी के विरुद्ध काम किया है। हालांकि हम पाप करने के दौरान अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाए पर फिर भी हमारे मन का एक हिस्सा इस बात के लिए अंत तक सचेत था कि हम गलत कर रहे हैं।

इस संसार मे कई लोग ऐसे भी हैं जिनके मन में इस तरह की भावनाएं उत्पन्न ही नहीं होती है। ऐसे लोग पाप के चंगुल में पूरी तरह से फंस चुके होते हैं पर इस बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। उनके लिए पाप करना बिल्कुल ही सामान्य बात हो जाती है और उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाती है। हमारे मन में उत्पन्न होती पश्चाताप की यह भावना हमें बताती है कि हम उन कुछ लोगों में से हैं जिनका हृदय पाप में पड़कर पूरी तरह से कठोर नहीं हुआ है।

यह मन-फिराव की प्रक्रिया का एक शुरुआती चरण है जिसके तहत हम अपने पापों को वहीं छोड़ कर आगे बढ़ने का निर्णय लेते हैं।

‘पाप-स्वीकार’ इसी की अगली कड़ी है जब हम ईश्वर के सम्मुख उपस्थित होकर यह स्वीकार करते हैं कि हमसे पाप हुआ है और इसके लिए उनसे क्षमा की याचना करते हैं। ईश्वर अपनी असीम करुणा को हमपर बरसाते हैं और हमारे पापमय जीवन से हमें स्वतंत्र करते हैं।

आइए अब हम पाप-स्वीकार को ईश्वर के वचन में से समझने का प्रयत्न करते हैं।

पाप-स्वीकार का बाइबलीय आधार-


पाप-स्वीकार केवल एक धार्मिक अभ्यास नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत विकास और स्वतंत्रता का मार्ग है। बाइबल में, हमें पाप स्वीकार करने और अपने पापों से दूर होने के लिए कहा जाता है, और इसके माध्यम से, हम ‘ईश्वरीय क्षमा से मिली स्वतंत्रता’ का अनुभव कर सकते हैं। 

यह भी पढ़ेंः-
1) उड़ाऊँ पुत्र का दृष्टांत और पश्चाताप की बाइबलीय सीख।
2) पापस्वीकार की विधि को जानें - कैथोलिक धर्मशिक्षा।
3) ‘येशु मेरे दिल में आइए’ - पापस्वीकार की तैयारी कैसे करें?


आपके लिए यहां बाइबल से पांच वचन लिखे गए हैं जो पापस्वीकार की शक्ति तथा महत्व के बारे में बताते हैं:

“यदि हम अपने पाप स्वीकार करते हैं तो वह हमारे पाप क्षमा करेगा और हमें हर अधर्म से शुद्ध करेगा; क्योंकि वह विश्वसनीय तथा सत्यप्रतिज्ञ है। - 1 योहन 1:9”

पाप-स्वीकार के माध्यम से, हम अपनी गलतियों को परमेश्वर के सामने स्वीकार करते हैं और उनसे क्षमा की याचना करते हैं। जब हम एक पश्चतापी हृदय के साथ ऐसा करते हैं, तो हम परमेश्वर की क्षमा का अनुभव कर सकते हैं और अपने सभी अधर्म से साफ हो सकते हैं। यह प्रक्रिया हमें हमारे पापों के अपराध और शर्म से मुक्त कर सकती है और हमें जीवन का एक नया उद्देश्य और आशा की एक नई भावना दे सकती है।

“पश्चाताप करो। स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है। - संत मत्ती 3:2”

जब योहन बपतिस्ता ने प्रचार शुरू किया था तब वह लोगों को पश्चाताप करने का संदेश दिया करता था। वह उन्हें अपने जीवन के पुराने तरीकों से दूर करने के लिए आमंत्रित कर रहा था और जीवन जीने के एक नए तरीके को गले लगाने के लिए कह रहा था। पश्चाताप केवल हमारे पापों को स्वीकार करने के बारे में नहीं है, बल्कि हमारे जीवन को बदलने और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीने के लिए एक सचेत निर्णय लेने के बारे में भी है। यह निर्णय हमें आदर्श और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने की स्वतंत्रता दे सकता है।

“मैं यहूदियों तथा यूनानियों, दोनों से अनुरोध करता रहा हूँ कि वे ईश्वर के प्रति पश्चाताप और हमारे प्रभु ईसा में विश्वास करें। - प्रेरित-चरित 20:21”

इस वचन में, पौलुस इस बारे में बात करते हैं कि कैसे पश्चाताप न केवल पाप से दूर होने के बारे में है, बल्कि ईश्वर की ओर मुड़ने और यीशु मसीह में विश्वास रखने के बारे में भी है। पश्चाताप के माध्यम से, हम ईश्वर के साथ एक गहरे और मधुर संबंध का अनुभव कर सकते हैं।

“क्योंकि जो दुःख ईश्वर की इच्छानुसार स्वीकार किया जाता है उससे ऐसा कल्याणकारी पश्चाताप/हृदय-परिवर्तन होता है कि खेद का प्रश्न ही नहीं उठता। संसार के दुःख से मृत्यु उत्पन्न होती है। - 2 कुरिन्थियों 7:10”

कभी-कभी, हमारे पापों और गलतियों को स्वीकार करना कठिन हो सकता है। हालाँकि, जब हम अपने पापमय कार्यों के प्रति दुःख का अनुभव करते हैं, तो हम उस दुःख को पश्चाताप में बदल सकते हैं, जिससे हम उद्धार और स्वतंत्रता की ओर जाते हैं। यह वचन हमें याद दिलाता है कि पश्चाताप हमें शांति और खुशी दिला सकता है, जबकि पश्चाताप से इनकार करने से हमारा जीवन निराशा भरा हो सकता है।

“अपने वस्त्र फाड़कर नहीं बल्कि हृदय से पश्चाताप करो और अपने प्रभु-ईश्वर के पास लौट जाओ; क्योंकि वह करुणामय, दयालु, अत्यन्त सहनशील और दयासागर है और वह सहज ही द्रवित हो जाता है। - योएल 2:13”

यह वचन हमें याद दिलाता है कि ईश्वर हमेशा खुले तौर पर हमें अपनाने के लिए तैयार रहते हैं जब हम पश्चाताप करते हैं और वापस उनकी ओर मुड़ते हैं। पश्चाताप के माध्यम से, हम ईश्वर की कृपा और दया की स्वतंत्रता का अनुभव कर सकते हैं, जो हमें कठिन समय के बीच भी शांति और आनंद दिला सकता है।

उपसंहार


पाप-स्वीकार के विषय में भली-भांति मनन-चिंतन करने के बाद हम यह कह सकते हैं कि इसका अभ्यास एक परिवर्तनकारी अनुभव हो सकता है जो हमें स्वतंत्रता, क्षमा और जीवन में उद्देश्य की एक नई भावना प्रदान करता है। ईश्वर की कृपा और दया की शक्ति के माध्यम से, हम अपने जीवन के पुराने तरीकों से दूर हो सकते हैं और आशा, आनंद और प्रेम से भरे जीवन जीने के एक नए तरीके को गले लगा सकते हैं। 

परमेश्वर के साथ संगति हमारे जीवन में आवश्यक है और पाप-स्वीकार के माध्यम से हम खुद को इस संगति के योग्य बनाते हैं। पाप-स्वीकार के द्वारा हम ईश्वरीय मेमने, हमारे प्रभु येसु ख्रीस्त के क्रूस-बलिदान को याद करते हैं और उसे स्वीकार करते हैं। इस प्रकार हमारे सभी पाप उनके पवित्र रक्त द्वारा धो लिए जाते हैं और हम पापमुक्त होकर प्रभु येसु में जुड़कर एक नयी संरचना बन जाते हैं।

जब भी हमें इस बात का एहसास होता है कि हमसे जाने-अनजाने में पाप हुआ है, हमें फौरन पाप-स्वीकार की तैयारी करनी चाहिए। आपको यथाशीघ्र कलीसिया की शिक्षाओं के अनुसार पाप-स्वीकार करना चाहिए। हमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि यथाशीघ्र हम खुद को पाप के बोझ से मुक्त कर लें और स्वतंत्रता का अनुभव कर सकें।

यदि आपको यह आलेख अच्छा लगा और आपने इससे अपने जीवन में बदलाव को महसूस किया तो इसे अपने परिचितों और प्रियजनों के पास जरूर शेयर करें।

Saturday, February 24, 2024

क्रूस का रास्ता ऑनलाइन चित्र | सम्पूर्ण प्रार्थना हिंदी में | पीडीएफ डाउनलोड लिंक सहित || Way Of Cross Online Photos | Complete prayer in Hindi | with PDF Download link

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अंतिम संशोधन - 24 फरवरी, 2024

प्रिय पाठकों, आपके लिए हमारी वेबसाइट पर 'क्रूस का रास्ता' प्रार्थना (Station of Cross Prayer) हिन्दी चित्रों के रूप में उपलब्ध कराई जा रही है। आप इस प्रार्थना को चित्रों के माध्यम से पढ़ सकते हैं तथा इन चित्रों को अपने प्रियजनों को भेज सकते हैं। 

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इस प्रार्थना का टेक्स्ट संस्करण ऑनलाइन पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

डाउनलोड पेज पर जाने के लिए यहाँ क्लिक करें। 

Thursday, January 18, 2024

थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र, अध्याय - 5 | हिंदी बाइबिल पाठ - First Letter of St. Paul to Thessalonians, Chapter - 5 | Hindi Bible Reading

                          


थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र

अध्याय - 5


जागते रहें

1 (1-2) भाइयो! आप लोग अच्छी तरह जानते हैं कि प्रभु का दिन, रात के चोर की तरह, आयेगा। इसलिए इसके निश्चित समय के विषय में आप को कुछ लिखने की कोई ज़रूरत नहीं है।
3) जब लोग यह कहेंगे: ’अब तो शान्ति और सुरक्षा है’, तभी विनाश उन पर गर्भवती पर प्रसव-पीड़ा की तरह, अचानक आ पड़ेगा और वे उस से बच नहीं सकेंगे।
4) भाइयो! आप तो अन्धकार में नहीं हैं, जो वह दिन आप पर चोर की तरह अचानक आ पड़े।
5) आप सब ज्योति की सन्तान हैं, दिन की सन्तान हैं। हम रात या अन्धकार के नहीं है।
6) इसलिए हम दूसरों की तरह नहीं सोयें, बल्कि जगाते हुए सतर्क रहें।
7) जो सोते हैं, वे रात को सोते हैं। जो मदिरा पीते हैं, वे रात को मदिरा पीते हैं।
8) हम जो दिन के हैं, विश्वास एवं प्रेम का कवच और मुक्ति की आशा का टोप पहन कर सतर्क बने रहें।
9) ईश्वर यह नहीं चाहता कि हम उसके कोप-भजन बनें, बल्कि अपने प्रभु ईसा मसीह के द्वारा मुक्ति प्राप्त करें।
10) मसीह हमारे लिए मरे, जिससे वह चाहे जीवित हों या मर गये हों, उन से संयुक्त हो कर जीवन बितायें।
11) इसलिए आप को एक दूसरे को प्रोत्साहन और सहायता देनी चाहिए, जैसा कि आप कर रहे है।।

विभिन्न परामर्श

12 (12-13) भाइयो! हमारी आप से एक प्रार्थना है। जो लोग आपके बीच परिश्रम करते हैं, प्रभु में आपके अधिकारी हैं और आप को उपदेश देते हैं, आप उनकी आज्ञा का पालन करें और प्रेमपूर्वक उनका सम्मान करें; क्योंकि वे आपके लिए परिश्रम करते हैं। आपस में मेल रखें।
14) भाइयो! हम आप से अनुरोध करते हैं कि आप आवारा लोगों को चेतावनी दें, भीरूओं को सान्त्वना दें, दुर्बलों को संभालें और सभी से धैर्य के साथ व्यवहार करें।
15) आप इस बात का ध्यान रखें कि कोई भी बुराई के बदले बुराई नहीं करे। आप सदैव एक दूसरे की और सब मनुष्यों की भलाई करने का प्रयत्न करें।
16) आप लोग हर समय प्रसन्न रहें,
17) निरन्तर प्रार्थना करते रहें,
18) सब बातों के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें; क्योंकि ईसा मसीह के अनुसार आप लोगों के विषय में ईश्वर की इच्छा यही है।
19) आत्मा की प्रेरणा का दमन नहीं करें
20) और भविष्यवाणी के वरदान की उपेक्षा नहीं करें;
21) बल्कि सब कुछ परखें और जो अच्छा हो, उसे स्वीकार करें।
22) हर प्रकार की बुराई से बचते रहें।

उपसंहार

23) शान्ति का ईश्वर आप लोगों को पूर्ण रूप से पवित्र करे। आप लोगों का मन, आत्मा तथा शरीर हमारे प्रभु ईसा मसीह के दिन निर्दोष पाये जायें।
24) ईश्वर यह सब करायेगा, क्योंकि उसने आप लोगों को बुलाया और वह सत्यप्रतिज्ञ है।
25) भाइयो! आप हमारे लिए भी प्रार्थना करें।
26) शान्ति के चुम्बन से सब भाइयों का अभिवादन करें।
27) आप लोगों को प्रभु की शपथ-यह पत्र सभी भाइयों को पढ़ कर सुनाया जाये।
28) हमारे प्रभु ईसा मसीह की कृपा आप सब पर बनी रहे।

थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र - 01-02-03-04-05

थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र, अध्याय - 4 | हिंदी बाइबिल पाठ - First Letter of St. Paul to Thessalonians, Chapter - 4 | Hindi Bible Reading

                          


थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र

अध्याय - 4


शुध्दता, भातृप्रेम और परिश्रम के लिए अनुरोध

1) भाइयो! आप लोग हम से यह शिक्षा ग्रहण कर चुके हैं कि किस प्रकार चलना और ईश्वर को प्रसन्न करना चाहिए और आप इसके अनुसार चलते भी हैं। अन्त में, हम प्रभु ईसा के नाम पर आप से आग्रह के साथ अनुनय करते हैं कि आप इस विषय में और आगे बढ़ते जायें।
2) आप लोग जानते हैं कि मैंने प्रभु ईसा की ओर से आप को कौन-कौन आदेश दिये।
3) ईश्वर की इच्छा यह है कि आप लोग पवित्र बनें और व्यभिचार से दूर रहें।
4) आप में प्रत्येक धर्म और औचित्य के अनुसार अपने लिए एक पत्नी ग्रहण करे।
5) गैर-यहूदियों की तरह, जो ईश्वर को नहीं जानते, कोई भी वासना के वशीभूत न हो।
6) कोई भी मर्यादा का उल्लंघन न करे और इस सम्बन्ध में अपने भाई के प्रति अन्याय नहीं करे; क्योंकि प्रभु इन सब बातों का कठोर दण्ड देता है, जैसा कि हम आप लोगों को स्पष्ट शब्दों में समझा चुके हैं।
7) क्योंकि ईश्वर ने हमें अशुद्धता के लिए नहीं, पवित्रता के लिए बुलाया;
8) इसलिए जो इस आदेश का तिरस्कार करता है, वह मनुष्य का नहीं, बल्कि ईश्वर का तिरस्कार करता है, जो आप को अपना पवित्र आत्मा प्रदान करता है।
9) भ्रातृप्रेम के विषय में आप लोगों को लिखने की कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि आप लोग ईश्वर से ही एक दूसरे को प्यार करना सीख चुके हैं
10) और सारी मकेदूनिया के भाइयों के प्रति इस भ्रातृप्रेम का निर्वाह करते हैं। भाइयो! मेरा अनुरोध है कि आप इस विषय में और भी उन्नति करें।
11) आप इस बात पर गर्व करें कि आप शान्ति में जीवन बिताते हैं और हर एक अपने-अपने काम में लगा रहता है। आप लोग मेरे आदेश के अनुसार अपने हाथों से काम करें।
12) इस प्रकार गैर-ईसाई आपका आदर करेंगे और आप को किसी बात की कमी नहीं होगी।

मृतकों का पुनरुत्थान और मसीह का पुनरागमन

13) भाइयो! हम चाहते हैं कि मृतकों के विषय में आप लोगों को निश्चित जानकारी हो। कहीं ऐसा न हो कि आप उन लोगों की तरह शोक मनायें, जिन्हें कोई आशा नहीं है।
14) हम तो विश्वास करते हैं कि ईसा मर गये और फिर जी उठे। जो ईसा में विश्वास करते हुए मरे, ईश्वर उन्हें उसी तरह ईसा के साथ पुनर्जीवित कर देगा।
15) हमें मसीह से जो शिक्षा मिली है, उसके आधार पर हम आप से यह कहते हैं- हम, जो प्रभु के आने तक जीवित रहेंगे, मृतकों से पहले महिमा में प्रवेश नहीं करेंगे,
16) क्योंकि जब आदेश दिया जायेगा और महादूत की वाणी तथा ईश्वर की तुरही सुनाई पड़ेगी, तो प्रभु स्वयं स्वर्ग से उतरेंगे। जो मसीह में विश्वास करते हुए मरे, वे पहले जी उठेंगे।
17) इसके बाद हम, जो उस समय तक जीवित रहेंगे, उनके साथ बादलों में आरोहित कर लिये जायेंगे और आकाश में प्रभु से मिलेंगे। इस प्रकार हम सदा प्रभु के साथ रहेंगे।
18) आप इन बातों की चर्चा करते हुए एक दूसरे को सान्त्वना दिया करें।

थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र - 01-02-03-04-05

थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र, अध्याय - 3 | हिंदी बाइबिल पाठ - First Letter of St. Paul to Thessalonians, Chapter - 3 | Hindi Bible Reading

                          


थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र

अध्याय - 3


तिमथी का प्रेषण

1) अन्त में हम से नहीं रहा गया। हमने अकेले आथेंस में रहने का
2) और अपने भाई तथा मसीह के सुसमाचार के प्रचार में ईश्वर के सहयोगी तिमथी को इसलिए भेजने का निश्चय किया कि वह आप को ढारस बंधाये और विश्वास में दृढ़ बनायें रखें,
3) जिससे कोई भी इन विपत्तियों के कारण विचलित न हो। आप लोग जानते हैं कि यही हमारे भाग्य में है।
4) आपके यहाँ रहते समय हम आप से कहा करते थे कि विपत्तियाँ हम पर आ पड़ेगी और जैसा कि आप जानते हैं, हुआ भी वही।
5) इसलिए जब हम से नहीं रहा गया, तो आप लोगों के विश्वास का समाचार जानने के लिए हमने उनको आपके यहाँ भेजा, क्योंकि हम डरते थे कि कहीं शैतान ने आप को लुभाया हो और हमारा परिश्रम व्यर्थ हो गया हो।
6) तिमथी अभी-अभी आप लोगों के यहाँ से लौटे और आपके विश्वास तथा प्रेम के विषय में अच्छा समाचार लाये। वह हमें बताते हैं कि आप सदा हम को प्रेम से याद करते हैं और हमें फिर देखने के लिए उतने ही उत्सुक हैं, जितने हम आप लोगों को दखने के लिए।
7) भाइयो! हमें अपने सब कष्टों और संकटों में आप लोगों के विश्वास से सान्त्वना मिली है।
8) यह जान कर हम में अब नये जीवन का संचार हुआ है कि आप प्रभु में दृढ़ बने हुए हैं।
9) आपने हमें प्रभु के सामने कितना आनन्द प्रदान किया है! हम आप लोगों के विषय में ईश्वर को पर्याप्त धन्यवाद कैसे दे सकते हैं?
10) हम दिन-रात आग्रह के साथ ईश्वर से यह प्रार्थना करते रहते हैं कि हम आप को दुबारा देख सकें और आपके विश्वास में जो कमी रह गयी है, उसे पूरा कर सकें।
11) हमारा पिता ईश्वर और हमारे प्रभु ईसा हमारे लिए आपके पास पहुँचने का मार्ग सुगम बनायें।
12) प्रभु ऐसा करें कि जिस तरह हम आप लोगों को प्यार करते हैं, उसी तरह आपका प्रेम एक दूसरे के प्रति और सबों के प्रति बढ़ता और उमड़ता रहे।
13) इस प्रकार वह उस दिन तक अपने हृदयों को हमारे पिता ईश्वर के सामने पवित्र और निर्दोष बनायें रखें, जब हमारे प्रभु ईसा अपने सब सन्तों के साथ आयेंगे।

थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र - 01-02-03-04-05

थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र, अध्याय - 2 | हिंदी बाइबिल पाठ - First Letter of St. Paul to Thessalonians, Chapter - 2 | Hindi Bible Reading

                         


थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र

अध्याय - 2


थेसलनीके में सन्त पौलुस का धर्मप्रचार

1) भाइयो! आप स्वयं जानते हैं कि आप लोगों के यहाँ मेरा आगमन व्यर्थ नहीं हुआ।
2) आप जानते हैं कि हमें इसके ठीक पहले फिलिप्पी में दुव्र्यवहार और अपमान सहना पड़ा था। फिर भी हमने ईश्वर पर भरोसा रख कर, घोर विरोध का सामना करते हुए, निर्भीकता से आप लोगों के बीच सुसमाचार का प्रचार किया।
3) हमारा उपदेश न तो भ्रम पर आधारित है, न दूषित अभिप्राय से प्रेरित है और न उस में कोई छल-कपट है।
4) ईश्वर ने हमें योग्य समझ कर सुसमाचार सौंपा है। इसलिए हम मनुष्यों को नहीं, बल्कि हमारा हृदय परखने वाले ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए उपदेश देते हैं।
5) आप लोग जानते हैं और ईश्वर भी इसका साक्षी है कि हमारे मुख से चाटुकारी बातें कभी नहीं निकलीं और न हमने लोभ से प्रेरित हो कर कुछ किया।
6) हमने मनुष्यों का सम्मान पाने की चेष्टा नहीं की - न आप लोगों का और न दूसरों का,
7) यद्यपि हम मसीह के प्रेरित होने के नाते अपना अधिकार जता सकते थे। उल्टे, अपने बच्चों का लालन-पालन करने वाली माता की तरह हमने आप लोगों के साथ कोमल व्यवहार किया।
8) आपके प्रति हमारी ममता तथा हमारा प्रेम यहाँ तक बढ़ गया था कि हम आप को सुसमाचार के साथ अपना जीवन भी अर्पित करना चाहते थे।
9) भाइयो! आप को हमारा कठोर परिश्रम याद होगा। आपके बीच सुसमाचार का प्रचार करते समय हम दिन-रात काम करते रहे, जिससे किसी पर भार न डालें।
10) आप, और ईश्वर भी, इस बात के साक्षी हैं कि आप विश्वासियों के साथ हमारा आचरण कितना पवित्र, धार्मिक और निर्दोष था।
11) आप जानते हैं कि हम पिता की तरह आप में प्रत्येक को
12) उपदेश और सान्त्वना देते और अनुरोध करते थे कि आप उस ईश्वर के योग्य जीवन बितायें, जो आप को अपने राज्य की महिमा के लिए बुलाता है।

थेसलनीकियों का विश्वास

13) हम इसलिए निरन्तर ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि जब आपने इस से ईश्वर का सन्देश सुना और ग्रहण किया, तो आपने उसे मनुष्यों का वचन नहीं; बल्कि -जैसा कि वह वास्तव में है- ईश्वर का वचन समझकर स्वीकार किया और यह वचन अब आप विश्वासियों में क्रियाशील है।
14) भाइयो! आप लोगों ने यहूदियों में स्थित ईश्वर की मसीही कलीसियाओं का अनुकरण किया है: क्योंकि आप को अपने देश-भाइयों से वही दुव्र्यवहार सहना पड़ा, जो उन्होंने यहूदियों से सहा है।
15) यहूदियों ने ईसा मसीह तथा नबियों का वध किया और हम पर घोर अत्याचार किया। वे ईश्वर को अप्रसन्न करते हैं और सब मनुष्यों के विरोधी हैं;
16) क्योंकि वे गै़र-यहूदियों को मुक्ति का सन्देश सुनाने से हमें रोकना चाहते हैं और इस प्रकार वे अपने पापों का घड़ा निरन्तर भरते जाते हैं और अब ईश्वर का क्रोध उनके सिर पर आ पड़ा है।

सन्त पौलुस थेसलनीके जाने को उत्सुक

17) भाइयो! जब हम कुछ समय के लिए आप लोगों के प्रेम से नहीं, बल्कि आप के दर्शनों से वंचित थे, तो हमें आप से फिर मिलने की बड़ी अभिलाषा थी।
18) इसलिए हमने अर्थात् मैं - पौलुस - ने अनेक बार आपके यहाँ आना चाहा, किन्तु शैतान ने हमारा रास्ता रोक दिया।
19) जब हम प्रभु ईसा मसीह के आगमन पर उनके सामने खड़े होंगे, तो आप लोगों को छोड़ कर हमारी आशा या आनन्द या गौरवपूर्ण मुकुट क्या हो सकता है?
20) क्योंकि आप लोग ही हैं हमारे गौरव और हमारे आनन्द।

थेसलनीकियों के नाम संत पौलुस का पहला पत्र - 01-02-03-04-05